श्रव्य-दृश्य साधन ( Audio-visual aids)

श्रव्य-दृश्य साधन Audio-visual aids


श्रव्य दृश्य सहायक साधनो का महत्व :-

  • शिक्षार्थीयो का ध्यान आकर्षित करना ताकि उनमें सिखने कि रूची उत्पन्न करना है।
  • विषय के मुख्य बिन्दुओ को स्पष्ट करने के लिये।
  • भाषा सम्बन्धीत परेशानी को दुर करने मे सहायक होती है।
  • सीखने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावशाली ढंग से नियोजित करती है।
  • किसी सन्देश को चित्र या दृश्य की सहायता से प्रस्तुत किया जाये तो
  • उसमें निहीत विचारो की तुलना, विषरण, फैलाव स्पष्ट हो जाता है भाषा की सहायता एवं दृश्य से अवगम तथ्यात्मक होती है।
  • इनसे विचार स्पष्ट ओर सरल होकर समझ में आते है।
  • शिक्षक को अपना विषय क्रमबद्ध संगठित करने में सहायता देती है।
  • सीखने की प्रक्रिया को बढ़ाते है।
  • दृश्य सहायक माध्यम की सहायता से सन्देश को कम समय में एक साथ अनेक लोगों तक पहुचा सकते है।
  • इससे शिक्षक तथा शिक्षार्थी का समय बचता है।


A.श्रव्य सामग्री-


श्रव्य सामग्री वह शिक्षण साधन है जिससे संदेश केवल सुन सकते है और देख नहीं सकते।

1.टेप रिकार्डर -

यह एक श्रव्य यंत्र है। ध्वनि का आलेखन डिस्क पर यांत्रिक
विधि से, टेप व तार पर आलेखन चुम्बकिय विधि से और चलचित्र आलेखन प्रकाशीय विधि से किया जाता है।

2.रेडियो-

भारत में सर्वप्रथम वर्ष 1924 में मद्रास प्रान्त रेडियो क्लब एवं वाई. एम.सी.ए. लाहौर द्वारा रेडियो प्रसारण सेवा प्रारंभ की गई। रेडियो के माध्यम से वार्ता, सूचनाएँ संबंधि मनोवृत्ति निर्मित हो सके। यह संदेश संचार की प्रभावशाली विधि हैं।

3.टेलीफोन-

टेलीफोन ऐसा यंत्र है जिसके द्वारा लोग एक स्थान से दूसरे स्थान जाए
बिना किसी विषय वस्तु पर वार्ता कर सकते है । इससे प्रसार कार्यकर्ता
कृषकों को कृषि, पशुपालन, स्वास्थ्य आदि की जानकारी देता हैं।


4.सार्वजनिक भाषण उपकरण-

इस उपकरण के तीन भाग होते है।


1.प्रवर्धक-


                  यह विद्युत तरंगो को प्रबधंन कर फैलाता है इसे विद्युत अथवा बेटरियों की आवश्यकता पड़ती है।

2.ध्वनि ग्राहक -

                 यह ध्वनि तरंगो को पुनः विद्युत तरंगो में बदल देता है।


3.ध्वनि विस्तारक -

                  यह प्रवर्धित तरंगो को पुनः ध्वनि तरंगो में बदल देता है। इसका उपयोग विद्यालयों चुनाव, भाषणों, मन्दिरो, मस्जिदों, गुरूद्वारों आदि में किया जाता है।

B.दृश्य-सामग्री-


यह शिक्षण सामग्री है जिससे संदेश केवल देख सकते है और सुन नहीं सकते।


*अप्रपेक्षणीय दृश्य सामग्री-

1.श्यामपट -


श्यामपट सबसे सरल, सस्ता, सबसे आसान तरीके से तथा सबसे ज्यादा उपयोग में आने वाला दृश्य सामग्री है। श्यामपट लकडी के बने होते है, उसमें काला रंग चढा होता है। दीवारो पर बनाये जाते है, इसलिये इसे श्यामपट कहा जाता है, जिन्हे कुंडलित कहते है।


2.सूचना पट-


यह लकडी या प्लाईवुड का बना हुआ बोर्ड होता है जिस पर कोई भी सुचना को लगाया जाता है। इस प्रकार के बोर्ड में सूचनाये लगाकर आफिस के पास लगा देते है। जब सूचनाओं को लगाने या लिखने के लिये प्रयोग करते है, तो नोटिस बोर्ड होता है। बोर्ड कम से कम दो मीटर ऊँचे होने चाहिए।
इसका आकार 75 गुणा 100 सेमी होता है। इस पर पेपर में सूचना लिखकर बोर्ड में पिन की मदद से लगाया जाता है।

3.तस्वीर एवं चित्र-


अनेक तस्वीरों की सहायता से किसी विषय को कहानी के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। ये वास्तविक दृश्य है जो किसी उद्देश्य से तैयार की जाती है।

4.फ्लेनल ग्राफ, फ्लेशकार्ड, फ्लिप चार्ट-


फ्लेनल ग्राफ, फ्लेशकार्ड एवं फ्लिपार्ट ये सभी दृश्य सामग्री है जिसमें कोई संदेश लिखा होता है, या बनाया जाता है। ये संदेश मोटे पेपर पर बनाया या लिखा जाता है तथा इन चित्रों को एक एक कर प्रदर्शित किया जाता है जिससे पूरी वार्ता विचार या क्रिया देखकर समझी जा सके। फ्लैश कार्ड कड़े कागत (30"x25") सेमी चित्रों को गड्डी है जो किसी विषय की कहानी या उसके चरणों को कमशः स्पष्टं प्रदर्शित करते है। पूरी कहानी को 10-12 कार्डो में बांट दिया जाता है फिर प्रत्येक कार्ड पर क्रमबद्ध चित्र अथवा डिजाइनों को बना लेते है। और समूह के समक्ष नम्बर से क्रमबद्ध प्रयोग किया जाता है। फ्लिप चार्ट में संदेशों का बड़े आकार के कागजों में लिखा जाता है या प्रत्येक पृष्ठ पर लिखकर या चित्रों के माध्यम से सूचनायें विस्तृत में लिखी होती है, जो कहानी के एक हिस्से को बतलाती हैं। उन्हें कैलेण्डर की तरह क्रमबद्ध किया जाता है। इसमें ऊपरी सिरे पर सभी कार्ड को नत्थी करते है। प्रसार कार्यकर्ता एक-एक पृष्ठ को खोलता है और साथ में विषय के बारे में बतलाता भी है । समूह में शिक्षा देने की अच्छी विधि है।

बनाना-

  • मोटे विभिन्न रंगों के कागज लेना चाहिए।
  • स्याही, पोस्टर के रंग, ब्रश, पेन्सिल , गोंद, रेतमाल, फ्लैनल बोर्ड, पिन इत्यादि अच्छे से उपयोग करना चाहिए।
  • बड़े अक्षर लिखने चाहिए जो दूर से भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
  • सरल, स्पष्ट चित्र बनाने चाहिए जो लोगो को आसानी से समझ में आ जायें।
  • पास-पास में अक्षर या चित्र नहीं बनाना चाहिए।
  • अच्छे रंगो का उपयोग करना चाहिए। यदि किसी आर्टिस्ट को जरूरत पड़े तो उसकी सहायता लेना चाहिए।
  • क्लास में प्रयोग करने से पहले ही प्रयोग सीख लेना चाहिए।
  • प्रदर्शित पदार्थों को क्रमबद्ध रूप से एवं नम्बर लगा देना चाहिए। बोर्ड ऐसे स्थान पर लगा जाये जहाँ प्रकाश एवं बैठने की उत्तम व्यवस्था हों।


प्रदर्शन-


  • बोर्ड के दायी और खडे होकर पोझइन्टर के द्वारा कोई भी विषय बतलाना चाहिए।
  • एक प्रदर्शन में 10-15 दृश्य सामग्री का उपयोग करना चाहिये।
  • श्रोताओं की टीका टीप्पणी पर ध्यान देना चाहियें, क्योंकि श्रोताओं द्वारा टीका-टिप्पणी आवश्यक है।
  • मेटेरियल्स को हमेशा प्रदेर्शन की स्थिति में तैयार करके रखना चाहिये।
  • दिखाने में स्थानीय नामों या ग्रामों के नाम के आधार पर कहानी बताई जाये।


5.पोस्टर-


यह कार्ड बोर्ड या कागज की एक सीट पर बनी होती है जिस पर कुछ साधारण शब्दो के साथ कुछ चित्र बना होता है। लोग पोस्टर को दूर से देख सकते है। यदि उद्देश्य संबंधित कोई चिज लोगों को आकर्षित करती है तो वे उसे ठहर कर देखते है। यह व्यक्तियों का ध्यान आकर्षित कर, उन पर तथ्यों की छाप डालने के लिये संदेश पहुचाने तथा तुरन्त ही क्रिया करने के प्रति प्रभावित करती है। इसका आकार 24"x36" उचित रहता हैं।

6.डायग्राम, चार्ट एवं ग्राफ-


डाईग्राम, चार्ट एंव ग्राफ में व्यक्तिगत सम्बन्धों, तुलनात्मक तथा भिन्नता को संगठित आधार पर प्रदर्शित करने के लिए प्रयोग किया जाता है।

  • डायग्राम में किसी वस्तु की संरचना या किसी विचार को चित्रित करने की रूपरेखा है।
  • कोई भी वस्तु की संरचना या किसी विचार के गुणो को चार्ट आकृति द्वारा दर्शाया जा सकता है। इसका प्रदर्शन सांख्यकीय गुणो चित्रों के आधार पर होता है। सांयकीय गुणो के उतार चढाव, विकास सम्बन्धों तुलना तथा विभिन्नता को स्पष्ट तथा सचिकर आधार पर ग्राफ पेपर पर प्रदर्शित करने को ग्राफ कहते है।



7.स्पेशीमेन और मॉडल-



स्पेशीमेन में वास्तविक वस्तुओं को माउन्ट और उपचार द्वारा संरक्षण कर लिया जाता है। इसमें ओरिजनल आकार में संरक्षण होता है। मॉडल में मनुष्यों की मॉडल रूचि बनाने में बहुत पुरानी है जैसे घर, इंजन, यंत्र आदि यह वास्तविक उद्देश्य के रेपिल्का होते है। ये वास्तविक उद्देश्य छोटे या बड़े हो सकते है।


*प्रक्षेपणीय दृश्य सामग्री-


1.स्लाईड-


स्लाईड फिल्म में कैमरे से पहले चित्र खींच लिया जाता है। इस स्लाईड को प्रोजेक्टर के द्वारा प्रकाश के माध्यम से बडा प्रतिबिम्ब बड़े पदे पर डाला जाता है। स्लाईडे 35 मिमि फिल्म में बनाई जाती है, और इनका आकार 2X2 इंच होता है, इन्हे बॉक्स में लम्बे समय के लिये सुरक्षित रखा जा सकता है।

2.फिल्म स्ट्रिप (फिल्म पट्टी)-


स्थाई चित्रों की श्रृंखला होती है। किसी क्रिया के प्रत्येक फिल्म स्ट्रिप चरण को क्रमबद्ध तरीके से जमाया जाता है। प्रत्येक पट्टी पर लगभग 30-60 चित्र, तस्वीर या अक्षर होते है। प्रत्येक चित्र में विषय से सम्बन्धित टाइटल होता है। सामान्यतः 70 मि.मी. या 35 मि.मी. की फिल्मों का शिक्षा के लिये उपयोग किया जाता है। इसमें लगातार एक के बाद एक चित्र को पर्दे पर दिखाकर उन्हें गतिशील दिखाया जाता है। इसमें 5-125 तक फोटो हो सकते है किसी क्रिया की प्रत्येक चरण की फोटो कैमरा द्वारा क्रमबद्ध तरीके से लेते रहते है। जब सभी चरण पुरे हो जाते है तो रील को निकालकर तैयार करवा लेते है। चलचित्र को सामान्यतः ट्रॅनिग प्रोग्राम में उपयोग किया जाता है।

C.  श्रव्य-दृश्य सामग्री-

यह वह शिक्षण साधन है जिनकी सहायता से संदेश को सुन भी सकते तथा देख भी सकते है।

*अप्रक्षेपणीय श्रव्य-दृश्य सामग्री
1.नाटक एवं कठपुतली-


नाटक में कुछ लोग मंच पर किसी विषय पर अपनी प्रस्तुति या अमिनय प्रस्तुत करते है । कठपुतली में छोटी-छोटी मनुष्यों की फोटो बनाकर विषय को इनके द्वारा डंदपचनसंजम किया जाता है, जिसे नाटक के रूप में मंच पर बनाकर दिखाया जाता है। कठपुतली विभिन्न प्रकार के होते है ।
जैसे - हाथ द्वारा चलायी जाने वाली, हाथ द्वारा धागे की सहायता से चलायी जाने वाली कठपुतली।

*प्रक्षेपणीय दृश्य-श्रव्य सामग्री
1.टेलीविजन / सिनेमा-


टेलीविजन या सिनेमा में चित्रों को और वार्ता दोनो का उपयोग एक साथ किया जाता है और लोग देख और सुनकर नई बातें सीखते है। शब्दों और तस्वीरों का इस प्रकार गठन करना कि एक कथा तैयार हो सके। इसमें सीन पर लगातार वार्ता के साथ तस्वीरें प्रदर्शित होती है। जिससे प्रदर्शन सामग्री गति में प्रदर्शित होती है। दूरदर्शन के प्रत्येक सफल कार्यक्रम के पीछे कुशल तैयारी का परिणाम है।

लाभ-

  • एक साथ कई लोगों से एक ही समय में सम्पर्क किया जाता है।
  • चयनित टारगेट समूह को प्रभावित किया जा सकता है।
  • नेताओं को प्रभावित करने के लिये।
  • व्यक्तियों की सबसे आवश्यक समस्याओं तथा स्थिति का ज्ञान होता है।
  • स्थानिय लोगो में नेतृत्व विकसित करने में सरलता होती हैं।
  • लोगो के विचारों को स्थानान्तरित को सुलझाने में अधिक उपयोगी होती है।
  • यह विधि जटिल समस्याओं को करने में अधिक उपयोगी होती है।
  • नयी तकनीकों को पद्धतियों को सीमांतरण करने में उपयोगी होता है।
  • कार्यकर्ता गहरे सम्पर्क में बना रहता है।


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